सोमवार, 22 अप्रैल 2013

ज़िन्दगी की किताब


ज़िन्दगी की किताब में लिख दिया हूँ 
अरमानों के अक्षरों से 
पर अभी तक सोच रहा हूँ, ये ख्वाब 
होंगे पुरे किस कदर। 

कितने तूफ़ान गुज़र गये 
जाने और कितने जीवन में आयेंगे 
जमाने की रंजिशो से लड़के 
कैसे अपनी तक़दीर बनायेंगे। 

सुर का तो मालूम है 
पर जीवन में राग का पता नहीं 
मंजिल तो सामने है मेरे 
पर राह अभी तक मिली नहीं। 

क्यों मुझे यह हर कदम पर 
मेरी फ़ितरत समझाता है 
जब आरज़ू मेरी सातवें आसमान की होती है 
तो उसे नादानी बतलाता है। 

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