घुमे मथुरा मक्का ख़ुब हुजूर
मैल मनों का फिर भी हुआ न दूर,
भूल गये है पंथ को संत मंहत
डूब रहाँ जग तम में दूर न अंत।
आजादी में अपना हाल अज़ीब
आधे पेट रह रहाँ आज गाँव गरीब।
इस कलियुग में ऐसा हुआ विकास
बदल सके न अब तक धनी व दास,
चाँद तूझी से खुश है चातक मोर
दुःखी हुआ केवल फिर आज चकोर।
कैसे लोग मनाए आज बंसत
चाहुं ओर नफ़रत हुई अनंत।
रे मन! जग जीवन में कठिन कठोर
बिन साहस, संयम, श्रम पास न ओर।
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