देते रहोगे धोखा, ख़ुद को कब तलक
होगी ना पूरी आरज़ू, हमारी जब तलक
उम्मीदों को कभी, बुझने न देगें हम
चलेगा साँस मेरी जब तलक।
सच है कि दूर है मंज़िल पर हौसले बुलंद है
रूकती नहीं है धार, मिले न साहिल जब तलक।
कांटे चुभेंगे राहों में, घायल भी होगे कदम
हासिल न हो मुकाम, सफ़र चलेगी जब तलक
चाँद और तारों पर नहीं, सूरज पर है अपनी नज़र
मंज़ूरे है काली रात भी, रोशनी ना मिलें जब तलक।
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